भारत के लिए होती मुश्किल इन मौकों पर रूस ना होता तो

भारत के लिए होती मुश्किल इन मौकों पर रूस ना होता तो

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत के दौरे पर हैंण् रूस और भारत के बीच 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर डील हो सकती है अगर यह डील होती है तो भारत की सामरिक ताकत में जबर्दस्त बढ़ोतरी होगी इस कदम के साथ भारत.रूस की वर्षों पुरानी दोस्ती और भी मजबूत हो जाएगी

भारत और रूस की दोस्ती बहुत पुरानी है बदलते समय के साथ भले ही बहुत सी चीजें बदली हों लेकिन अब भी दोनों देशों के लोगों में आपसी विश्वास कायम है भारतीय आज भी यह बात मानते हैं कि रूस भारत का दोस्त और सहयोगी है ना कि बिजेनस पार्टनरण् रूस ने भारत के मुश्किल वक्त में हमेशा साथ दिया इतिहास में भारत रूस की दोस्ती के तमाम अध्याय लिखे जा चुके हैं तो चलिए पलटते हैं कुछ पन्ने

औपनिवेशक देश होने की वजह से भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने की कोशिश कीण् भारत नियमित तौर पर अपनी पसंद और जरूरतों के हिसाब से सहयोगियों की समीक्षा करता रहता है शीत.युद्ध के समय भारतीय नेताओं ने गुट.निरपेक्ष की नीति बनाईण् वर्तमान में अब इसे रणनीतिक स्वायत्तता का नाम दिया गया है

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भारत शीत युद्ध के वक्त में सोवियत संघ और अमेरिका दोनों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहता था हालांकि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सोवियत संघ से प्रभावित थे और वह समाजवाद के पक्षधर थे इन सबके अलावाए पाकिस्तान के यूएस के सहयोगी बनने से भारत रूस और करीब आ गए

कई सालों तक आर्थिक और सैन्य मोर्चे पर सोवियत की मदद से भारत को यह विश्वास हो गया कि सोवियत उसका मजबूत सहयोगी है पहले सोवियत और फिर रूस की हथियारों की बिक्री को भारत को एक बाजार के तौर पर देखने के बजाए भारतीयों ने हमेशा इसे गहरे भावनात्मक रिश्ते की तरह देखा

कश्मीर पर यूएन रिजॉल्यूशन पर सोवियत का वीटो नई दिल्ली में रणनीतिक गणित की तरह नहीं बल्कि सोवियत की दोस्ती के तौर पर लिया गया

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